ग़ज़ल...12
ग़ज़ल...12
बेज़ान दग़ाबाज़ दिलों सी न फ़ज़ा है।
नापाक ख़ता कर न पढ़ो ज़ुर्म कज़ा है ।
क्या हाल करे इश्क़ हमें देख जताकर,
हम आज हमीं हो न सके इश्क़ सज़ा है।
सौदा न किया देख यहीं नोच लिया ख़ुद,
जा ज़ान ज़िगर जिस्म मिरा बेच मज़ा है।
ख़ुदग़र्ज़ ज़माना न रहा था न रहेगा,
मत मान कहा ज़ान मिरी आज रज़ा है।
हैं गैर वही जो न दिए प्यार ज़रा सा,
'गुलशन' न खिला फूल यहॉं देख अज़ा है।
