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Disha Singh

Abstract

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Disha Singh

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घर खोजने निकले हैं

घर खोजने निकले हैं

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शहर में घर खोजने निकले हैं 

पर मुलाक़ात बड़े बड़े मकानों से हो गई ,

थक कर समंदर के पास क्या आये 

तो बचपन से रूबरू हो गई। 


अब आराम कहाँ हैं इन ढांचों में

बड़े-बड़े, नये-नये कमरों में 

 सुख सोच कर आये थे 

पर ख़ाली हाथ रह गये। 


पल पल दिन बिताये थे यू 

समय हाथ से निकल गये क्यों 

दीवारों से क्या छुपा हैं 

इन सबने भी दर्द सहा है। 


हर एक कोने में आवाज़ गूँज रही हैं 

अकेले बैठ कर देखो कानों में चुभ रही हैं

घर घर होता हैं 

जैसा भी हो वो अपना होता है। 


यहाँ ख़रीदरी में टिके हैं दुनिया सारी 

पर इंसान खुद से भी बेखोफ़ रहता है 

मन करे तो बात करता हैं 

वरना चुपचाप खुद को नज़रअंदाज़ करता है।


आपका घर हमेशा आपसे कुछ कहता हैं 

चाहें आप सुने या न सुने 

जब अकेले होता मन हमारा 

घर जाने की ज़िद करता हैं

और सोचता है।


काश की घर पास होता 

पूरे परिवार के साथ होता  

किराये के मकानों में वो ताज़ी हवा की खुशबू कहाँ

जो घर के छज्जों में हैं 

घर कह कर यहां "मकान" ही शब्दों में है।


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