घमंड का परित्याग
घमंड का परित्याग
अहम का वहम जब निज से छूट जाए
तब ही अलौकिक निर्वाण का पथ खुल जाए
निर्वाण पाने के लिए ज्ञान पाना ज़रूरी होता है
ज्ञान पाने के लिए अपना अहम मिटाना जरुरी होता है
इतिहास गवाह है घमंड से सदा विनाश का द्वार ही खुला है
ज्ञान पर ज्यों ही अभिमान का पर्दा पड़ा है
नहीं समझ पाता है इंसान क्या सच क्या धर्म है या कौन सगा है
घमंड ने ही रावण को खाया,घमंड ने ही कंस को हराया
अंहकार ने किया बाली को परास्त
अंहकार ने भुलाया प्रजापति दक्ष को शास्त्र
महिषासुर हो या रक्तबीज,चंद्रमा हो या हो इंद्र ही
सबको अहंकार की है सज़ा मिली
राम हो या कृष्ण, नहीं पिया कभी भी इन्होंने घमंड नामक विष
दुर्योधन ने सबकुछ गंवाया
सारे जग ने उससे अहम छोड़ने का पाठ है पाया
आज जो हो तुम तुम से भी हैं या होंगे बेहतर कई
तुम सबसे ऊपर नहीं,ऊपर है वो ईश्वर सदा ही
सूर्य से भी उज्ज्वल सूर्य हैं कई
एक ब्रम्हा एक ही ये ब्रह्मांड नहीं
अवगत रहो सदा इस सच से
बढ़े चलो खुद को बेहतर बनाने के पथ पे
ज्ञान गुण सफलता खुशियां मिलती है मानव को कठिन संघर्ष से
आभार प्रकट करना पाकर इन्हें प्रभु का तुम हर्ष से
शालीनता की नहीं कोई तुलना है
याद रखना अव्वल मानवीय सद्गुणों से जुड़ना है
जीवन में कुछ प्यार भरे सच्चे रिश्ते और सुकून हासिल करते हैं
बीते कल से लेकर सीख हम नए कल का आगाज़ करते हैं
आओ घमंड भाव का परित्याग करते हैं।
