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Jonty Dubey

Drama Classics Thriller

4  

Jonty Dubey

Drama Classics Thriller

ग़फ़लत

ग़फ़लत

2 mins
250

जीवन का एहसास जगाने वालों से,

जी! हम हारे हैं अपने जिगरी यारों से ।।


ज़ेहन में अपने चल रहता है पागलपन,

जंग जितना है इस दुनिया के भालों से।।


जलवा खुद का अपने मन को भाया है,

गुजर जाते है अपनी तनहा हालों से।।


भोली सुरत जिनकी छाई आखों में, 

अब वो निबाहें नाता हम मतवालों से।।


अमावस ने फैलाया घोर अंधेरा रातों में,

तो खुद से जोड़े रीश्ता अब उजालों से।।


तरसे लोंगो की बढ़ जाती है बेताबी,

बरसों बादल प्यार भरे बुंदालो से।।


बदला बदला वक्त का आलम भारी है,

चलते रहना! रुकना नही पाँव के छालों से।।


ख़्वाब सजाये घूम रहे हैं कूचों में ,

रुह भटकती रहती है। जवालो से।।


मासूम का कब तक है ये सफ़र,

कुछ तो फुर्सत मिले ग़म के नालों से।।


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