गगनांगना छंद.....
गगनांगना छंद.....
पग-पग सबको संबल मिलता,जब परिवार हो।
हॅंसती गाती रहती दुनिया,सम फुलवार हो।।
पग-पग सबको संबल...
कौन सुखी अरु कौन दुखी है, किसका कौन हो।
बॉंधा मुट्ठी खुलता जाए, जीवन मौन हो।।
यह जग दुखमय आता जैसे,भाटा ज्वार हो।
हो कोई अपना फिर दुख में,प्रेम सवार हो।।
पग-पग सबको संबल...
देखो एकल दूर खड़े तुम,इक सागौन हो।
भाव व्यथा की सुन लो तुम जब,चलती पौन हो।।
समता जल हिय में रखिए बस,कर पतवार हो।
जीना सीखो रहकर हद में, इक दीवार हो।।
पग-पग सबको संबल...
