एक सोच ऐसी भी
एक सोच ऐसी भी
अगर सोचता बादल ऐसे...
क्यू में भर भर लाऊ पानी तुमारे लिए,
तुमारी प्यास केलिए क्यू में सागर से मांगने जाऊ पानी !!!
अगर सोचता पौधा एसे...
क्यू में प्राणवायु बनावु तुमरे लिए,
तुजे छाँव देने क्यू में खड़ा रहू धुप मे !!!
अगर सोचता चाँद एसे...
क्यू में चांदनी फेलाऊ तेरे लिए,
शीतल सी रौशनी देने तुजे क्यू में अंगारे समाऊ खुदमे !!!
अगर सोचती नदिया ऐसे...
क्यू में चलू पहाड़ो के रास्ते पानी लाने तेरे लिए,
तुजे जीवन देने क्यू में चलू कठिन रास्ते
और मिलादु खुद को समुंदर में !!!
अगर सोचते रस्ते ऐसे...
क्यू में खुद बिखरु मंजिलो से तुजे मिलाने,
तेरे चलने के लिए क्यू में मेरे पे बोज उठाऊ !!!
अगर सोचते प्रभु ऐसे...
क्यू में बनावु तुजे तेरे जीने केलिए,
अच्छा हो या बुरा, भला ही क्यू न हो वो तेरा,
कोसेगा तो तू मुझे ही !!!
अगर सोचता मनुष्य ऐसे...
मिला हे ये अमूल्य जीवन मुझे,
मिली हे ये सारी सवलते,
तो क्यू न खुद को बनाऊ अच्छा इन्सान
और जतन करू इसका !!!
