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Anuradha Negi

Abstract

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Anuradha Negi

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एक रात उठी थी मैं

एक रात उठी थी मैं

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गहरी नींद से अचानक जाग गई मैं

खिड़की खुली थी एक रोशनी आई 

फिर मैंने देखा कि अभी आधी रात है 

और डर से फिर बिस्तर में भाग गई मैंं।


दुबारा रोशनी नेे दस्तक दी चेहरेे पर मेंरे 

चंद्रमा लिए रखा था बहुत दूरों तक घेरे 

फिर इच्छा की छोड़ बिस्तर बाहर जाऊं मैं 

क्यों आया देर रात वो उससे पूछ आऊं मैं।


खोली किवाड़़ और झांक कर देखा आंगन 

चौंक गई थी देख कर धरती लिए थी दर्पण

रातें भी इतनी खूबसूरत होती हैंं इस जहांं में 

चारों ओर शांति व मुस्कुराता चांद आसमां में।


बस मन था कि उसे निहारती जाऊं मैं रात भर

कोई कहे मामा किसी को सनम दिखे याद पर 

क्यों महसूस हो रहा कि कोई आवाज था लगाए

जिसके लिए चांद है पूरी रात पलकें बिछाए। 


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