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Alka Nigam

Abstract

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Alka Nigam

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एक प्याली चाय

एक प्याली चाय

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एक प्याली चाय की तलब तो

हमें भी है।

जो.......

मिट्टी के सकोरों के

किनारे से,

अल्हड़ मदमस्त तरुणी सी छलकती हो।

जिसमें सूरज का ताप भी

भाप बन उड़ जाए।

स्याह रातों को ढकती

चाँदनी सी मलाई हो।

गुलकन्द से लबों की मिठास हो 

और ....साथ में.....

तुम्हारा हँसीं साथ हो।

बाँट लेंगे हम....

न कम न ज़्यादा,

इस मिट्टी के सकोरे में 

भरी मिठास को 

आधा आधा।

कुछ कुरमुरी सी बातें

साथ में करेंगे।

और हाँ......

चलते वक़्त 

उस चाय की टपरी वाले को

पैसे दे देंगे कुछ ज़ियादा।

के शायद....

दुआओं की कुछ अठ्ठनियां

हमारी झोली में भी

भर जाएँ।




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