“एक प्रश्न”
“एक प्रश्न”
टूट जाते हैं अक्सर,
पत्थर से दृढ़ पुरुष भी…
हार जाते हैं अक्सर,
चट्टान से अडिग पुरुष भी…
ये हारना, ये टूटना — तब नहीं होता…
जब जीवन बार-बार,
बार-बार तोड़ता है हमें…
परंतु वह तब टूट जाता है…
जब कोई प्यार से पूछ ले —
“क्या हुआ…?
कुछ तो कह दे…
मत शर्मा…
बस बह जाने दे हर दुख को…”
तब वह टूट जाता है…
और जीवन के सब दुख भूल…
बस सब त्याग देता है…
— शिवांश झा “क्षितिज”
