“दो भाषाओं के बीच”
“दो भाषाओं के बीच”
हिंदी का प्रेम नहीं,
उर्दू का इश्क़ किया है…
रातें हिंदी के
हलन्तों के संग गुज़ारीं,
दिन उर्दू के
नुक़्तों को दे दिए…
तो फिर मेरा क्या?
मेरा इश्क़,
मेरा प्रेम,
मेरा फ़ख़्रपन…
और वह एक सपना,
जो कभी
कविताएँ लिखते हुए
देखा था…
— शिवांश झा “क्षितिज”
