"शून्य से फिर "
"शून्य से फिर "
कुछ कहना था…
सुन सकोगी क्या?
हम कोसों दूर चले आए…
हाँ, हम भी रोए उतने ही,
आँसू जितने तुमने बहाए।
अंतर बस इतना रहा—
हम किसी और बात पर रोए,
तुम किसी और बात पर…
कुछ कहना था तुमसे…
सुन सकोगी क्या?
हमें भी कमी उतनी ही खली,
दोस्तों की—
जितनी शायद तुम्हें खली।
पर न हम तुमसे कह पाए,
न तुम हमसे कोई गिला कर सकीं…
जीवन की इन परिस्थितियों में
हम कोसों दूर चले आए।
आँसू बहाए,
पर समय निकालकर
तुमसे कुछ कहने का अवसर न मिला…
कुछ कहना था तुमसे…
सुन सकोगी क्या?
अब हम दूर हैं…
न तुम्हारा मन है
कुछ गपशप का,
न हम में अब
हिम्मत बची है।
फिर भी—
कुछ कहना था तुमसे…
सुन सकोगी क्या?
वही सुकून
फिर दे पाओगी क्या?
मैं शायद थक गया हूँ—
जीवन की आपाधापी में
कहीं दूर दब गया हूँ…
पर अगर कोई गिला हो,
तो तुम कह देना।
हम नाराज़ नहीं होंगे—
न अब हैं,
न कभी थे,
न शायद हो पाएँगे।
आख़िर कैसे भूल पाएँ
मित्रता के
वे मीठे पल?
अब वैराग्य नहीं—
साथ चाहिए।
जीवन के सफ़र का
मित्र,
हमसफ़र चाहिए।
जो हुआ,
उसे हो जाने दें।
आओ,
शून्य से फिर शुरू करें—
एक नई कहानी,
एक नया सफ़र।
रथ की सारथी तुम,
और मैं तुम्हारे साथ—
मित्र।
अंजाम मुझे भी पता है,
उत्तर शायद जान भी गया हूँ…
पर फिर भी—
शुरू से शुरू करें…?
जहाँ मुझे
एक नई मित्र मिले,
और “क्षितिज” नहीं—
बस तुम,
और तुम्हारी बातें हों…
— शिवांश झा “क्षितिज”

