एक पिता के मन की आवाज
एक पिता के मन की आवाज
निकल गयी सारी जमीन मेरे कदमों तले,
सोच रहे पिता घर बैठे अकेले,
सींचा था बचपन से अपने बुढ़ापे के लिए,
वो छोड़ऩे लगे हमें अभी से।
क्या कमी रह गई मेरी परवरिश में,
क्या नहीं दे पाये हम इनमें,
जो ऐसी उपज मिली अंत में,
अभी भी उम्मीदें बाकी हैं पर भरोसा नहीं।
क्योंकि अब ये जो ऊँगली,
पकड़कर चलना सीखे थे हमारी,
बताने लगे हमें अब क्या गलत है और क्या सही।
उनके लिए छोड़ा जग सारा,
ताकि फैले उनकी जिदंगी में उजियारा,
पर उन्हें हममें नहीं मिलता जहान सारा,
अपनी अलग दुनिया जो बसा ली।
कर दिया इसने हमें खाली,
हम अपने दुख अब किसे कहें किसे समझाएं,
जो पहले हमारी एक झलक से सब समझ जाते थे,
वो अब लाख समझाने पर भी समझते नहीं।
हम दोनों को अपनी दुनिया अधूरी लगती है,
कमी अपने प्यारे बच्चों की खलती है,
आ जाओ तुम अपना लो बस,
हम तो माँ बाप हैं, तुम कैसे भी क्यों न हो।
प्यारे हो हमें, हम तो तुम्हें अपना लेंगे जस का तस,
खुश रहो सदा आशीर्वाद हमारा है,
तुम अकेले नहीं हो, सारा जहान तुम्हारा है,
तुमने हमें नही हमें तो, इस दुनिया ने ही मारा है,
जिनके लिए तुममें बसता, हमारा जहान सारा है।
