एक नारी
एक नारी
एक नारी सिर्फ,
नारी ही नहीं होती,
प्रेम का अथाह सागर,
समर्पण की गागर,
भरी होती है जो कभी,
खाली नहीं होती,
कहने को,
तो बहुत रूप है,
हर रूप में नारी,
अभिव्यक्ति है,
किरदार में ढलकर ,
फर्ज़ निभाती,
मन में उम्मीदों की उड़ान
सबका रखकर मान
सबकी उम्मीदों की परख
पर खरे उतरने की कोशिश,
में नारी खुद का,
अस्तित्व तलाशती,
कभी - कभी अकेले पड़ जाती है,
निकल जाना चाहती है जैसे पिंजरे से,
पंछी उनमुक्त गगन में,
फिर भी लौटना चाहती है,
अपने घरौंदो की ओर,
क्योंकि उसे परवाह है,
उसकी जो उसके अस्तित्व से,
कहीं न कहीं जुड़ा है .....
