एक होकर अलग
एक होकर अलग
याचना नहीं कर्तव्य करो,
धर्म, कर्म से आता है।
कर्म अपना कर्तव्य समझो,
उसे मूल्यांकन आता है॥
बेराह न चलना तुम,
धर्म - अधर्म बन जाएगा!
याचना को रचना में बदलो तुम,
वरना भविष्य ग़म से भर जाएगा॥
अन्यमनस्कतापूर्ण बातें न करो,
जो सच लगता हैं सीधे कहो।
असत्य की राह पकड़ ली तो,
धोखा दे जाएगा वो॥
वो किसी की विरासत नहीं,
है तो जीवन की जमापूंजी।
उसपर फ़िदा हो जाओ अगर,
तो फ़तह ख़ुद-ब-ख़ुद जाएगी निखर॥
धरा, वसुंधरा, भू है एक अगर,
तो आदम - मनु क्यों अलग-अलग।
हैं आदम - मनु एक तो,
कर्म - धर्म कैसे अलग हो ॥
अमर्त्य अंक है यही,
कर्म मार्ग है सही।
धर्म किसी को बाँटता नहीं,
फिर क्यों जंग घड़ी - घड़ी ?
क्यों उसने बनाया सभी को एक समान ?
क्यों हिंदू को भगवा रंग न मिला,
क्यों हरा न जन्मा मुसलमान ?
आखिर किसने शुरू किया यह
जंग का सिलसिला ?
हर रणभूमि क्यों लाल हो जाती है ?
क्यों वो लालिमा प्रीत की न होती है ?
चोट लगने पर सबको दर्द क्यों होता है ?
यह वह तो नहीं, जिसे वह इंसाफ कहता है ?
कौन है इन दरारों का निर्माता ?
क्यों है उसने जहानों को बाँटा ?
क्यों है हर निर्माता का निर्माण एक सा ?
फिर भी इनका एक होना क्यों है ख़्वाब सा ?
