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Dayasagar Dharua

Abstract

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Dayasagar Dharua

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दूसरी छोर

दूसरी छोर

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लो !

वो आ रहा है


ठहर ठहर कर

गति बदल बदल कर

पहले भेज रहा है झोंके

हवाओं के हल्के हल्के


कहता है उँचे टहनी से

बुजुर्ग पत्तों को तोडते तोडते

न्यौता भेजा है उसने

जल्द लौटेंगे नये कोमल पत्तें


फिर चला कपोतों के यहाँ

कानाफूसी करने

और न जानें क्या कह डाला

उनके झुंड बिखरने लगे


माँओं से बच्चे छूटने लगे

दूर सुदूर उड़ानें वो भरने लगे

लचिले पंखों मे मजबूती आयी

अपनों से अलग वो ठहरने लगे


अपनें विपरीतों से वे मिलने लगे

प्यार की बातें करते करते

अलग आशियाना रचने लगे

माँओं ने सोचा,

कि चलो बच्चे सयानें होने लगे


और आखरी साँसें वे गिनने लगे

उसी तरह

जिस तरह बुजुर्ग पत्तियाँ

बिखरे पडे थे पहाड़ी के तलहटी मे

टहनियों मे नयी पत्तियाँ लाने की चाह में


पर हकीकत कुछ और थी

लाल लाल फूलों से

सेमल का पेड़ भी लाल था

प्रेमालाप में रत वहीं पे

कपोतों का एक जोड़ा था


फिर कंकड़ लगा कपोती को

जो किसी गुलेल से उछला था

चल बसी कपोती

जिन्दा कपोत ही अकेला था

और भी जिन्दा उनके

साथ जिने मरने का वादा था

जो कपोत को भी ले लपेटा


अब बस जंगल में

सन्नाटा ही सन्नाटा था

फिर आग लगी पूरे जंगल में

सुखे पत्तों की अगुआई में

भभक उठा हर कोना विद्रोह में

मार भगाया वसन्त को

वापस ऋतुओं की माला में


पर अफवाह ये गलत फैली

कि वसन्त आ कर जा चुका था

सारे प्रेमियों को मिला चुका था

कोमल पत्तियाँ खिला चुका था

है बागी धूपने सब को बहकाया

क्षणभंगुर वसन्त को दोषी ठहराया

वसन्त के कन्धे पर बारूद रखकर

आग सृष्टि पर बरसाया।


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