द्रोण की व्यथा..!!
द्रोण की व्यथा..!!
एकलव्य की तरह लक्ष्य साधने से,
किसने रोका है तुम्हें...?
मैं तो वचनबद्ध हूँ
उस कर्ज से ,
जिसके कारण मैं आज हूँ
नमक का कर्ज...
बेटे के लिए बाप होने का फर्ज़ निभाया
दूध के लिए गिरवी रख आया ,
अपनी स्वतंत्रता /
अपनी विद्या /
और अपना मान-सम्मान /
सबकुछ धर आया
उसके महल के चौखट पर
बांध आया था स्वयं को उसी छड़
उसके कुटुंब के मान-सम्मान के साथ,
अब नहीं था मेरा अपना कुछ भी...!
पर तुम...!
तुम स्वतंत्र हो...!
साध लो अपने लक्ष्य को..
नहीं बंधे तुम्हारे हाथ
नहीं रोक सकता कोई तुमको...!!
