दर्द
दर्द
दर्द बढ़ता ही गया,
हम सहते ही गए,
धीरे - धीरे इस दर्द को,
अपना कहते ही गए।
पहले एक टीस उठी,
फिर आदत सी बनी,
दर्द हममे और हम,
दर्द में घुलते ही गए।
दर्द बेबाक हँसा,
और मेरे साथ चला,
दर्द के संग हम अपने,
घावों को कुरेदते गए।
दर्द और मेरा संगम,
प्रेमिका- प्रेमी का मिलन,
सारी रात सुहागरात में,
हम उलझे रहे।
सुबह एक आह हुई,
दर्द की राह हुई,
दर्द फिर से अपनी,
मर्दानगी बिखेरे हुए।
धूमिल अब चेहरा हुआ,
घनघोर अंधेरा हुआ,
दर्द और ना सहने का,
निश्चय गहरा हुआ।
ओढ़ पलकों का भरम,
संग लिए अपने करम,
एक सुकून भरी साँस लिए,
हम रुखसत हुए।
