STORYMIRROR

Dr Arun Pratap Singh Bhadauria

Abstract

4  

Dr Arun Pratap Singh Bhadauria

Abstract

दर्द सीने में छुपाये

दर्द सीने में छुपाये

1 min
214

दर्द सीने में छुपाये जी रहा हूँ,

अपने आप से नाराज हो के जी रहा हूँ।

कुछ लम्हों की खुशी के लिए ही सही,

बहुत समय से खुश नहीं रहा हूँ।


हर पल यादों में खोया हुआ हूँ,

तुम्हारी यादों में जी रहा हूँ।

दर्द सीने में छुपाये जी रहा हूँ,

अपने आप से नाराज हो के जी रहा हूँ।


दर्द सीने में छुपाये जी रहा हूँ,

आँखों से आंसू बहाये जी रहा हूँ।

तुम्हारी यादें आती हैं रातों में,

मगर उन यादों से बचाये जी रहा हूँ।


दर्द सीने में छुपाये जी रहा हूँ,

अपने आप से नाराज हो के जी रहा हूँ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract