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Kavita Sharrma

Abstract

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Kavita Sharrma

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दोहे

दोहे

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कोई न छोटा ना बड़ा है बात है निराधार।

धूल जो पैरों तले रहती है आंधी में पाती शीश पर स्थान।।


पौधे खिलते उपवन में बिना भेदभाव ।

मानव फिर क्यों रह सकता नहीं बिना मन मुटाव।।


नफ़रत आग समान है न दीजिए इसे तूल

रिश्तों का बड़ा मोल है प्रेम से लो इसे जोड़।।


ईश्वर कहो, अल्लाह कहो, या कहो नानक।

वो सब सबका मालिक है बस एक ही उसे मानो।।


अहं न मन में राखो कभी है यह बुरा विकार।

विनम्रता सबसे श्रेष्ठ है अपनाओ बारंबार।।


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