STORYMIRROR

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

4  

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

दो दरवाजे

दो दरवाजे

1 min
301

मैं दो में ही उलझा हूं जबसे

गिन रहा हूं दो आंख दो कान

हर चीज़ के दो पहलु


दिन रात, धूप छांव

उपर नीचे,स्त्री पुरुष

यश अपयश पाप पुण्य

जीना मरना, और तो और

अच्छे, बुरे के दो पल


जीवन भर पीछा करती

मरने के बाद भी

दो दरवाजे स्वर्ग और नर्क

आखिर मानव किसका चुनाव करे


ये अपने निर्मित नहीं

फिर धकेला जाता है जीव

जीने के लिए यहां से वहाँ

दो दरवाजे पर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract