दिन बरसात का
दिन बरसात का
बरसात का दिन था, सूना बस स्टॉप था,
लड़की के पास छाता था, लड़का खाली हाथ था।
लड़की शहर की थी, लड़का वहां मेहमान था।
अंजान था रास्तों से थोड़ा परेशान था।
लड़की ने पूछा था, कहाँ तक जाना है?
यह शहर मेरा है, पूछ लो जो जानना है।
पता एक लड़के ने उसको दिखलाया।
देख कर लड़की का दिल घबराया।
मोहल्ला उसका था, सड़क भी वही थी,
जहाँ पर लड़की, बचपन से रही थी।
घबराहट से निकल कर उसने फिर सोचा...
मोहल्ला बड़ा है उसे कहीं अलग जाना होगा।
अच्छा है मंज़िल दोनों की एक है,
दिक्कत न होगी, क्योंकि रास्ता भी एक है।
बस बड़ी देर से भटकी हुई थी,
पिछले स्टेशन पर लटकी हुई थी।
हार कर दोनों ने ऊबर बुलायी।
गाड़ी में बैठ कर बरसात से मुक्ति पायी।
मोहल्ले में पहुँच कर लड़की ने कहा...
ये वही जगह है, जो एड्रेस में लिखा।
उतरती हूँ मैं अब, आगे आप जाएँ,
वहीं पहुंचेंगे आप, जहाँ के लिए आये।
सामान कुछ ख़रीद के लड़की घर पहुँची।
माहौल देख कर थोड़ा सा चौंकी।
पिता के साथ वही लड़का बैठा था।
भाई उस बन्दे की ख़ातिर में लगा था।
पीछे के रास्ते वह घर में घुसी थी...
माँ बेचैनी से उसे ही जोहती थी।
लड़की को देख कर माँ ने समझाया-
तुझे देखने को वही लड़का आया।
लंदन वाला डॉक्टर, जो तुझको तो बताया है,
लंदन से सीधा अभी-अभी आया है...
आपने सोच लिया सुनाया वही चैप्टर...
"दे लिव्ड हैप्पिली एवर आफ्टर।"
बाकी है पिक्चर अभी, उठ कर न जाइए,
आगे के सीन से पर्दा उठाइये....
लड़की ने माँ से कहा, क्या आप जानती हैं?
इस लड़के की एक टाॅंग आर्टिफिशल लगी है
(पाठक समझदार हैं मुझे भरोसा है, आगे का सीन आप पे छोड़ा है )

