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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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दिलों में दूरी

दिलों में दूरी

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कई बार दिलों में दूरियाँ अचानक नहीं धीरे धीरे आती हैं ...

रिश्ते एकदम से नहीं, धीरे-धीरे टूटते हैं...

दो में से कोई एक ऐसा होता है जो रिश्ते में अपना वजूद,

अपनी जगह ही तलाश करता रह जाता है और दूसरा उसकी जगह

उसके वजूद की दो पैसे की क़ीमत नहीं रखता 

एक के लिए हर चीज़ -हर बात मामूली और बेमानी होती है,

वहीं दूसरे के लिए उन दोनों से जुड़ी हर चीज़, हर बात ख़ास होती है।।


एक के लिए सौ लोगों की भीड़ में से भी वही ख़ास होता है,

वहीं दूसरे के लिए उस के मुक़ाबले दूसरी हर चीज़ हर बात ज़्यादा ज़रूरी होती है...

एक चाह के भी भुला नहीं पाता ,दूसरा कछ याद ही नहीं करता,

एक उसके ज़रा सा भी हर्ट होते ही गिल्टी महसूस करने लगता है,

वहीं दूसरा ग़लती से अगर हर्ट कर दे तो भी बेफ़िक्र रहता है ...


एक बोलना चाहता है और दूसरा ख़ामोश रहना चाहता है

ऐसे रिश्ते, रिश्ते होकर भी रिश्ते नहीं होते ये रिसते हैं

और घाव की तरह रिसते रिसते एक दिन जानलेवा नासूर हो जाता हैं,

पर तकलीफ़ सिर्फ़ उसे होती है जिसने संवाद की इच्छा रखी,

क्योंकि रिश्ता बहते हुए पानी की तरह रहे तभी उचित,

अन्यथा पानी के जैसा एक जगह ठहर कर सड़न पैदा करता है।


हो सकता है दोनों सही हों पर तकलीफ़ उसी एक को होती है

जो दिल से सोचता है या जिसने रिश्ते में अपना 100% लगाया हो ...

अगर सभी दिल की मंज़िल से ऊपर दिमाग़ तक चले जायें

यानी दिल से नहीं सभी दिमाग़ से सोचने लगे तो ....????

सोचिए ... दुनिया में दिल से सोचने वाले लोग यदि ना हों तो

और सब दिमाग़ से प्यार करें दिल से नहीं.... ???

तो रिश्ते सिर्फ़ नपे तुले व्यापार जैसे हो जाएँगे।

इसलिए दिल से सोचने वालों की क़द्र करिए……..!!



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