ध्यान में झूला
ध्यान में झूला
ध्यान में तो है मनुष्य
और मन ढूंढ रहा है
दुनिया में जीवन,
और उसकी जिज्ञासा
झूल रही है
झूला,
अतीत से भविष्य तक
ध्यान, में ही।
जिज्ञासा ,मन के झूले पर झूलती हुई
देखती है अतीत ,सुनती है उसका कोलाहल
और ठकुवाये वर्तमान को
निरखती हुयी लौट आती है भविष्य से।
दृश्य अतीत , धुंधले भविष्य
चीखते अतीत और मौन भविष्य
के केंद्र विंदु जीवन
और जीवन को
एक नये नजरिये से लबालब
भरा हुआ देखती हुई
झूलती हुयी तय करती है
मनुष्य की सक्रियता की
नयी दिशायें, कर्म के नये क्षेत्र
और यकीनन इतने भर से
ठकुवाया हुआ वर्तमान
मचलने लगता है
सक्रिय हो उठता है
और लगता है ऐसा तो
अतीत में कभी नहीं था
और यहाँ सब कुछ बदल रहा है
जज्बात जो वस्तु की तरह
विचारों का हिस्सा बन गये थे
पिघल रहे हैं
और अपनी अपनी जमीन पर
अजनवी से खड़े मुस्करा रहे हैं
जैसे कि वे वस्तु नहीं थे
जमीन थे जीवन की
और जीवन उलझ गया था
जज्बात और यथार्थ के बीच।
अब वर्तमान सक्रिय हो उठा है
अतीत का शोर थम गया है
तो भविष्य झलकने लगा है
जीवन कर्म के इर्द गिर्द।
