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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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जीवन का आधार

जीवन का आधार

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जो जीवन का आधार है
उसकी स्वीकार्यता का परीणाम ही है कि
 हम जीवन के उदगम बिन्दु पर खड़े थे
और जब चले जीवन की तरफ जीवन के साथ
 तो लगा एक नदी बह रही है
और किनारे किनारे भाव के घाट जगमगा रहे हैं।
 नए आयाम स्थापित हो रहे हैं
और स्थापनाएं विस्थापित हो रही है
 इस नये आयाम से।
अब कुछ नया नया सा निर्मित हो रहा है
लगता लग रहा है मृत्य भी आकर्षण का
एक केंद्र बिंदु बन गई है
और जीवन पहले से अधिक मुकम्मल होने को है।


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