धन ही आधार?(कविता)
धन ही आधार?(कविता)
क्या धन ही आधार है जगत का ? है ये जटिल सवाल
यह सच है धन के बिना नहीं हो सकता कोई भी काम
धन है हर एक विनिमय का आधार, धन की रहती है जरूरत
पर धन का दुरुपयोग है ग़लत, असल में सद्गुणों का है महत्व
धन वक़्त को खरीद नहीं सकता और रोक भी नहीं सकता
मगर धन हमारे मन और तन को शांति ज़रूर है देता
धन बिस्तर ज़रूर है खरीद सकता मगर नींद नहीं
पर खाली पेट नींद भी कहाँ आती है! धन है ज़रूरी
धन की अत्यधिक लालच ठीक नहीं, जितना चाहिए उतना सही
धन के पीछे भागने में आज इंसान में इंसानियत भी नहीं रहीं।
