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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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देवकीनंदन

देवकीनंदन

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काले बादल आज छाए तो बहुत थे।

लगा जमकर बारिश होगी, लेकिन वह तो चल दिए। 

किसी और का पुरसुकून बनने, किसी और के खेत लहलहाने।

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कभी गिरते गिरते संभलते हैं सब ,कभी संभलते संभलते गिरते हैं सब ।

संभलने- संभालने, गिरने -गिराने में उलझे हैं इस कदर। 

जिंदगी जीए कैसे, है किसको अब यह फ़िकर।

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यूं ही वक्त बेवक्त निकलते रहे।

 तो जिंदगी से रिहा हो जाएंगे।

,जल्द ही अलविदा कह जाएंगे।

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युद्ध हो अंतिम विकल्प शांति में प्रेम का महत्व। 

धर्म संगत , कर्म संगत ।रास्ते बनाए तर्कसंगत। 

ऐसे हैं हमारे गिरधारी, देवकीनंदन।

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यह घड़ी अत्यंत विकट है ।

लेकिन सभी निकट है ।

दिखते सभी चिंतित है ।

लेकिन फिर भी निश्चिंत है।


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