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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract

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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

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देखो

देखो

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तरकीब बदलती तकदीर देखो,

कटोरा पकड़ा हुआ अमीर देखो ।

झूठी लगती संप्रभुता व अखंडता,

अखण्ड भारत में नए-नए कश्मीर देखो ।।


लोलुपता में बिकता ज़मीर देखो ।

सलाखों सी कर्तव्यों की जंजीर देखो ।

धर्मांधता की लड़ाई कब थमेगी,

बीच मझधार में रोता आज कबीर देखो ।।


नालियों में बहता पावन नीर देखो ।

पकवानों में विलुप्त होता खीर देखो ।।

ऐश-ओ-आराम ने मेहनत छीन ली,

छोटी सी रोग से रोगी होता शरीर देखो ।।


वृक्ष विहीन तपता हुआ राहगीर देखो ।

धर्म की बोली लगाता धर्मवीर देखो ।।

सदियों से अभिशाप रही दहेज,

बेटी खातिर पिता को बनते अधीर देखो ।।


शब्दांशों से घाव होता गंभीर देखो ।

कटु वचनों का अकाट्य तीर देखो ।

किस-किस से प्यार करें साहब,

सब में कोई रांझा तो कोई हीर देखो ।।


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