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Shubhra Ojha

Abstract

4.8  

Shubhra Ojha

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देहाती औरतें

देहाती औरतें

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ये देहाती औरतें

अनपढ़ कहांँ होती है

लाखों का हिसाब

उंगलियों पर कर देती हैं।


हो गई है छुटकी की

उम्र कितनी

पल में गिन लेती हैं।


याद रखती है

अपने घर से मायके का

रास्ता भी किलोमीटर में।


बताती है बबुआ का

बुखार भी फॉरेनहाइट में

हर तीज़, त्यौहार की

तारीख याद रखती है।


सारे हिंदी महीने,

पूरा पतरा मुँहजुबानी

याद रखती है।


ये पढ़ क्यों नहीं पाई

कभी-कभी इसकी

कहानी सुनाती है।


है इनके पास

कोई डिग्री नहीं

यह अफसोस जताती है।


जब दद्दा फसलों का

हिसाब करने बैठते हैं

घूंघट के नीचे से,

मन ही मन मुनाफा

जोड़ जाती है।


ये देहाती औरतें

अनपढ़ कहांँ होती है।


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