चलो गाँव चले
चलो गाँव चले
चलो गाँव चले यारों
कुछ फर्ज़ निभाने को
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को
जिन खेतों को सींच सींच
माँ-बाप ने हमको सींचा है,
उस बंजर परी ज़मीन से फिर
हीरे-मोती उपजाने को..
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
जिस पगडण्डी पे नंगे पाँव
हम माँ के पीछे चलते थे
अब ना थके फिर माँ कोई
ऐसी सड़क बनाने को...
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
जिस आँगन में सब मिल जुलकर
रोटी बांटके खाते थे,
उन आँगन की दीवारों को
प्रेम से तोड़ गिराने को
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
हर चोट में काका की टॉफी
काकी भी माँ सी लगती थी
उनकी यादों में रहने को
फिर से बच्चे बन जाने को
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
दादा दादी, नाना नानी,
वो तालाब का ठंडा पानी
वो मंदिर की बजती घंटी
को क्या समझेंगे uncle aunty...
गेहूं के फसलों को कंघी करना
यारी पे जीना मरना
भरी दुपहरी, आम की चोरी
जब पापा बनते थे घोड़ी,
दादा की छड़ी, चाचू की घड़ी,
दिखावटी डांट, कर आँखे बड़ी बड़ी,
कैसे भूल गए हम ये सब
दो वक़्त की रोटी खाने को...
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
अब ऐसी घड़ी भी आई है
ना अपना है, ना अपने है,
ना खाने को रोटी मिलती
बस आँखों में टूटे सपने हैँ,
सब रिश्ते नाते पैसों के
सब देख लिए कैसे कैसों के,
बच्चे भी रोते रहते हैं,
भूखे सोते रहते हैं,
बीवी के आँखों में आशा है,
पर चेहरा जरा रुआंसा है,
अब भी माँ (धरती माँ) कहती है "आ जाओ "
बेटे का फर्ज़ निभा जाओ,
ना भूखा सोने दूँगी
ना बच्चों को रोने दूँगी,
दो वक़्त की रोटी यहाँ भी है
बांकी सारा जहाँ भी है,
धरतीपुत्र कहलाने को...
चलो गाँव चलो यारों
बचे क़र्ज़ चुकाने को...
