चलो एक नया शहर बसाते हैं
चलो एक नया शहर बसाते हैं
क्या हुआ शहरों को आज कल, सब कुछ जैसे धुआँ धुआँ है,
ऐसी तो न थी शहरों की जिन्दगी, जाने इन्हें क्या हुआ है ?
प्रेम की बहती थी जलधार, रहते थे सभी आपस में मिलकर,
न रंगभेद, न मतभेद, रहते थे एक दूजे का सहारा बनकर।
अब तो तासीर बदल गई शहरों की, मन में फ़ैल गया धुआँ,
कहीं जाति द्वेष का धुआँ, तो कहीं है धर्मान्धता का धुआँ।
हर तरफ देखो फ़ैल रहा, वैमनस्य का काला कलुषित धुआँ,
मन में धुआँ, तन में धुआँ, अंदर भी धुआँ, बाहर भी धुआँ।
हर ओर उड़ रहा काला धुआँ, जैसे निराशा के काले बादल,
है यह दूरभावों का धुआँ और निकल रहा दूषित काला जल।
बादलों के संग मिल यह धुआँ, कर रहा धरा माँ को प्रदूषित,
धुंए ने उड़ कर आसमान में, बादलों को भी किया कलुषित।
जिधऱ देखूँ उधर ही है धुआँ, बस धुआँ, धुआँ, और धुआँ,
धमनियों से निकल रहा धुआँ, अल्फाज़ भी उगलते धुआँ।
इस धुंए की सोहबत में, अंतर्मन हो गया सब धुआँ धुआँ,
हर ओर मौत का मंजर, हर ओर निकल रहा कलुषित धुआँ।
धुंए के इस कराल रूप ने, शहरों को कर दिया धुआँ धुआँ,
बादल अब जल न बरसाते, उनका अंतर्मन हुआ धुआँ धुआँ।
प्रकृति रो रही, शहर दर्द से कराह रहे, कर रहे हूआँ हूआँ,
जाने कब, क्यों, कैसे, फैलता गया मन में यूँ धुआँ धुआँ ?
इस माहौल में अब नहीं रहा जाता, धुएं से होती है घुटन,
देखता हूँ लोगों में जब नफ़रत, होती है दिल में चुभन।
चलो अब इस शहर से निकल, कहीं और चले चलते हैं,
नये शिरे से कहीं हम सब, चलो एक नया शहर बसाते हैं।
एक ऐसा शहर, जहाँ न होगी दिलों में नफ़रत, होगी प्रीत,
संस्कारों के बहेगी मधुर बयार, सनातन धर्म की होगी जीत।
न होगा यूँ दिलों में धुआँ, मन होंगे सभी के पावन पवित्र,
लिखेंगे हम एक नया इतिहास, रच देंगे हम एक नया चरित्र।
नफ़रत का यह जाल न होगा, मन में कोई दुर्भावना न होगी,
दिल में हो सौहार्द और सद्भाव, कोई न होगा मन से रोगी।
समरसता की बयार बहेगी, बड़े बुजुर्गो की भी होगी चौपाल,
छोटे करेंगे बड़ो का सम्मान, एक दूजे का सब रखेंगे ख़्याल।
