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Manisha Wandhare

Abstract

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Manisha Wandhare

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चिरागों को धोखा हुआ होगा...

चिरागों को धोखा हुआ होगा...

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अंधेरा इसी गली में था ,

चिरागों को धोखा हुआ होगा ...

जलते रहें वो रात दिन,

कतरा कतरा उनका बहा होगा...

जब आई रोशनी मिलने,

अस्तित्व उसमें समाया होगा,

सांझ आते आते खुदपे ,

रहरहकर इतराया होगा...

लौ ने बाते की हवाओं से ,

दुःख अपना छिपाया होगा,

जलते चिरागों सें क्या कहे,

अंधेरा दूर करके मुस्कुराया होगा...

कभी एहसास आसमान का,

चांदनी को जमीं पे बिछाया होगा,

चमक चमक कर रात को,

दिन सुहाना बना दिया होगा ...

अंधेरा इसी गली में था ,

चिरागों को धोखा हुआ होगा ...

जलते रहें वो रात दिन,

कतरा कतरा उनका बहा होगा...



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