चीखें
चीखें
चीखें गूंजती हैं
मेरे कानों में
निर्भया की
गुड़िया की
प्रियंका की और भी न जाने
कितनी लड़कियों की
सोने नहीं देती
मुझे यह चीखें।
किस हालात से गुज़रती होंगी
यह बेटियां
जब उन्हें चारों ओर एक दो नहीं
चार चार हैवान नज़र आते होंगे
अपने भाई बहनों को आवाज़ देती होंगी
अपने माता-पिता को पुकारती होंगी
तुमने पैदा ही क्यों किया था
अच्छा होता
कोख में ही मार दिया होता
कैसे वे दया की भीख
मांगती होंगी
कैसे वे हाथ जोड़
गिड़गिड़ाती होंगी
कैसे विनती करती होंगी
कैसे वे हर पल मौत को
समीप आते देखती होंगी
कैसे वे कल्पना में अपने
अधजले शरीर को देखती होंगी
कैसे वे चीख चीख
कर आंसू बहाती होंगी
कैसे मुंह में रुमाल
ठूंस जाने के उपरांत
गुमसुम हो जाती होंगी।
कसूर इतना
वह लड़की बनकर पैदा हुई है
इस दुनिया को आगे
चलाने के लिए
प्रकृति ने ही उसे पैदा किया है
सुंदर-सुंदर बच्चों को जन्म देने के लिए।
कितनी भयावह स्थिति है
नारी के कोख से पैदा हो
नारी को नोच डालते हैं दरिंदे।
मेरा सोचना था
लड़कियां सुशिक्षित हो जाए
लड़कियां स्वाबलंबी हो जाए
लड़कियां आत्मनिर्भर हो
जाए लड़कियां आत्मविश्वास
से भर जाएं
हो सकता है
रेप खत्म हो जाएं
दरिन्दगी खत्म हो जाएं।
निर्भया नौकरी करती थी
गुड़िया स्कूली छात्रा थी
प्रियंका तो डॉक्टर थी।
कुछ हुआ क्या ? नहीं न।
क्या करूं
इनकी चीखें गूंजती रहती है
मेरे कानों में
सोने नहीं देती यह चीखें।
