छल
छल
दोस्ती में ही छल रहा है वो!
आदत से ही बदल रहा है वो
जीस्त में वो रहा नहीं मेरी
यादों में ही ढ़ल रहा है वो
गैर हूँ उसकी नजरों में जैसे
पास से ही निकल रहा है वो
कब ख़ुशी में शामिल हुआ मेरी
हाँ ख़ुशी से ही जल रहा है वो
पहले वादा किया मुहब्बत का
अब ज़ुबां से पिछल रहा है वो
भेज था फ़ूल उसे मुहब्बत का
गुल पैरो से मसल रहा है वो
कब ख़ुशी से"आज़म" गुजारे दिन
ग़म भरा दिल में पल रहा है वो।
