चैन की रात
चैन की रात
जब बसंत धीरे -धीरे जा रहे होते हैंं
तो पीछे छोड़ते चैत की राते
बहुत सी अनकही बातें भी बोलने लगती
जब मन करने लगती खुराफातें
यूं तो संजीदगी का सबब कुछ भी होते हैं
परन्तु हसरतों को लोग कहाँ ही भुलते हैं
कोयल और पपीहे के कूक की बरबस यादे
भींगती पलकों की आसुओं को तोलते हैं।
आप के बोल सुनाए हमें क्या कुदरतें
जों बसंत के वादियों में मीठे होते हैं
बिखरने लगते ख्वाह में ताश के पत्तो की तरह
जैसे ग्रीष्म में हवा के झोंके से आम गिरते हैं।
तरन्नुम भी बदलती मौसम के अनुसार
किसी एक के घर में कहाँ रहते हैं।
यदि बसंत में बोतें हम सरसों तो
चैत में आकर ही कटते हैं ॥
खैर बसंत में आती बौरे खिलती कोंपले
फिजा की मादकता को भरा करते हैं
परन्तु जब जाने लगती फाल्गुण
निज स्वरुप परिवर्तन किया करते हैं।
हम नही भूलते हयात के खुशियों को
क्योंकि दुखों के अंबार लगा करते हैं
जब जिन्दगी बेहया का मिजाज बनाए
तो चैत में गेहूं भी कटा करते हैं।
गमनीम रातें में लिखते गमनीम बातें
जब गम सिर चढ़ा करते हैंं
यदि हमारी हसरतें ही गम दे
तो खुदगर्ज का नाम लिया करते हैंं।
