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Mani Loke

Comedy Classics Thriller

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Mani Loke

Comedy Classics Thriller

चांदी के वो तार

चांदी के वो तार

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वो चाँदी के तार उलझे जो मेरे कंघे में आज,

दिला गये अफ़साने कई याद, उम्र और उसकी गिनती आज।

उम्र का आईना थे वो, मेरे तजुर्बों के गिनतियां थीं वो।

पहले श्याम अब श्वेत बन उलझे थे वो,

चुपके से मेरे उम्र को बढ़ा गए थे वो,

उलझते थे झड़ते थे, कई दफा कंघे से टूटते थे वो,

अब की बार जो उलझे वो,मन को पंछी बना उड़े थे वो।


वो चांदी के तार उलझे जो मेरी कंघी में फिर जो आज,

मेरे बचपन की यादों को भी संग लाये थे आज,

घर मे दुलारे थे हम, माँ बापू के आंखों के तारे थे हम,

हर जन्मदिन पर टॉफी और तोफों के हकदार थे हम।


दो चोटी में, जो श्याम रंग के रस्सियों सी थीं,

बड़े इतराकर फिरते थे हम।

फिर उम्र बड़ी कुछ, चुटिया हटा पोनि-टेल में घूमते थे हम।

हर उम्र में केशों संग उलझते थे हम।

आज बात कुछ और थी, रंगों की देखों मौज़ थी,

पहले जो काली घटाओं सी थीं, श्वेत अम्बर को दर्शातें हैं आज।


हर तार का एक तज़ुर्बा और संग उनके नई चुनौती को समझाते हैं आज। 

उलझ कर फिर से वो चाँदी के तार ।उलझे जो मेरे कंघे में आज।

दिला गये अफ़साने कई याद, 

उम्र और उसकी गिनती को आज।


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