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Nilofar Farooqui Tauseef

Abstract

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Nilofar Farooqui Tauseef

Abstract

चाँद क़सूर

चाँद क़सूर

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चाँद का इतना सा क़सूर है

नज़रों के सामने, फिर भी दूर है।


चलो माना ये दुनिया का दस्तूर है

पर ये दर्द देना तो फितूर है।


तड़प का एहसास पूछो चकोर से

हर रोज़ जो करता इन्तज़ार ज़रूर है।


शायद मेरे इश्क़ में, आज भी सुरूर है

जो मेरे चाँद को इतना ग़रूर है।


हां मेरे चाँद को इतना ग़रुर है।


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