STORYMIRROR

Sunita Shanoo

Drama

2  

Sunita Shanoo

Drama

बुढ़ापा

बुढ़ापा

1 min
447

बुढ़ापे में नही रह पाता बुढ़ापा

बन जाता है आदमी बच्चा सा ही

चीखता-चिल्लाता है ज़िद करता है

मचलता है बच्चों की तरह ही...


जरूरत पड़ने पर

दुलार दिया जाता है 

तो कभी गैर जरूरी समझ

फटकार दिया जाता है...


रूठता है मनाता है खुद को

मान-अपमान भूलता सा

एक उम्मीद में जीता है आदमी

कि शायद कभी...


उँगली थामने वाले हाथों को भी

मिल पायेगी एक उँगली की पकड़...।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Sunita Shanoo

Similar hindi poem from Drama