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Deepanshi Kesharwani

Abstract Classics

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Deepanshi Kesharwani

Abstract Classics

बता सकती तो

बता सकती तो

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खामोश क्यों हूं अगर बता सकती तो

कब का बता दिया होता।

बेचैनी किस दिन से है, 

बताना होता तो कब का बता दिया होता।

राज तो होते ही हैं छुपाने के लिए ,

अगर बताने के लिए होते तो कब का बता दिया ना होता।।


रात अंधेरी है, सुबह उजाला।

पर फिर भी मन में नहीं अंधियारा।।

मचा तूफान है सवालों का,

अगर इस तूफान को शांत होना होता तो कब का हो चुका ना होता।

जिंदगी एक कठपुतली है।


अरे, मुझसे नचाना आता होता तो कब का नचा लिया ना होता।।

जो खूबियां है ना, चुनती नहीं सबको 

तभी तो पांचों उंगली सबकी बराबर नहीं होती 

अरे यार, सपने तो होते ही हैं देखने के लिए।

पर सच्चाई में लाना ना सबके बस में नहीं होता।।


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