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Ashish Anand Arya

Abstract

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Ashish Anand Arya

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बसन्त से..पिघली चाय...

बसन्त से..पिघली चाय...

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पिघल गयी चाय भी

मौसम के मिजाज में,

पैमाना उतर गया पूरा अंदर

बिना ढले अपने अंदाज में !


पहाड़ों की चोटी पर

अपने सफेद लिबास

से बिछा बिछौना

अपने हाथों से ढालकर

एक बर्फ का गोला


खींच मारा मौसम ने

इतनी दूर

हमारे कमरे से झाँकते झरोखे पर

कि उबल पड़ी

घर के हर मेहमान के गले से


एक खुशी की चीख,

दरवाजा

फिर पूरी शान से खुला

सरसरा पड़ी अंदर को हवा

जैसे ही उसने लोगों की आहट को सुना


और सर्दी की सकपकाहट से

कंपकंपा कर

पिघल गयी

प्यालों में छनती चाय !


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