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umesh kulkarni

Abstract

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umesh kulkarni

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बढ़ती उम्र

बढ़ती उम्र

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बढ़ती उम्र का एहसास तब हुआ

जब बिना चश्मे के अख़बार पढ़ने में दिक्कत आने लग गया

जब चौराहे पर बगलवाले ने मदद का हाथ देने लग गया

जब सिग्नल तोडा मुझको, हवालदार, हँसकर जाने देने लग गया 

जब छोटे बच्चों के साथ मुझे भी खाना मिलने लग गया

जब ख़ूबसूरत हसीनां, बिना झिझक, मेरे पास बैठने लग गए।


बढ़ती उम्र का एहसास तब हुआ

जिन्हे हम ने बोलना सिखाया

उन्हीसे.. चुप रेहनेका हिदायत मिलने लग गया

बढ़ती उम्र का एहसास तब बहुत.. बहुत ज्यादा हुआ।


इसीलिए कहता हूँ

वक़्त रहते ही वक़्त गुजारने का कोई जरिया सीख लीजिये

कोई नयी बात या कोई मसगला सीख लीजिये..

कुदरत से अंदाज़-ए-गुफ्तगू सीख लीजिये ..

या रब में गुम होने का कोई सलीका सीख लीजिये।


मन के गहराई से आत्मा की छवि निखरती है

शांत नदी में ही तो गहराई साफ़ दिखाई देती है

गहराई में रब की छबि देख लीजिये

मन सागर को शांत करने का कोई तरकीब सीख लीजिये।


किया कराया.. अच्छा बुरा.. समंदर में डाल दीजिये

हकीकत-ये-जिंदगी से आँख मिलाना सीख लीजिये

सफ़ेद बालों पर कोई मजाक उड़ा न पाए

अपने आप में स्वस्थ और मस्त रखना सीख लीजिये।


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