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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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बरगद का पेड़

बरगद का पेड़

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बहुत याद आती है बरगद तेरी 

जिसमें करते थे हम हेराफेरी

सारा बचपन तेरे साथ ही बीता,

तुझ बिन धड़कने अधूरी है मेरी

बहुत याद आती है बरगद तेरी

वो बचपन की बाते

दोस्तो से मुलाकातें

तुझे देख याद आती है

बहुत सी पुरानी यादे मेरी

अब सब कमाने में लगे है

तुझे सब सताने में लगें है

फ़िर भी सबसे मिलने की

उम्मीद बरकरार है तेरी

बहुत याद आती है बरगद तेरी

वो बहुत ममता भरी छांव तेरी

जिसमे करते थे हम बाते गहरी

बहुत मस्तापन था तेरी शाखाओं में

खेलते कूदते 

पता ही नही चलता

सुबह से हो जाती थी दोपहरी

बहुत याद आती है बरगद तेरी

आज ये दुनिया भेदभाव से भरी है

हर जगह ही इंसानों की टूटी कड़ी है

फ़िर भी तूने बिना मतलब

सबको दी है छाँव तेरी

बहुत याद आती है बरगद तेरी

मां सा प्यार तू बांटता है

पिता सा दुलार तू करता है

मुझे तो लगता है,

सांसो से ज़्यादा जरूरत है तेरी

बहुत याद आती है बरगद तेरी

दिल से विजय


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