STORYMIRROR

Rajiv Jiya Kumar

Abstract Classics

4  

Rajiv Jiya Kumar

Abstract Classics

☆बोलती खामोशी☆÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

☆बोलती खामोशी☆÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

1 min
217

लफ्ज कहाँ से लाए 

हैैं लब सिले

दरकिनार किया

हर शिकवे गिले

रूह सिसक

रह गई खड़ी

नादां समझता


कुुछ तभी

खामोशी भेद 

सारा बोल पड़ी।।

अश्क पलक के

ओट में सिमटे

धड़कनें थमती दिखीं

बेचैन हसरतेें


ठिठक हीं गयीं

अरमां की टूूूटी लड़ी

कसक न कहा

कुुछ भी कभी

खामोशी भेेद

सारा बोल पड़ी।


मुद्दई बन हैैं खड़े

रहबर जबकि

हम ही रहें

यकीन था

रहनुमा संंग है


यकीं की छूटी कड़ी

जज्बात समेटते

रह गए 

खामोशी भेद 

सारा बोल पड़ी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract