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अच्युतं केशवं

Abstract

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अच्युतं केशवं

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बज गये पाँच

बज गये पाँच

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बज गये पाँच 

उतर लिए

ऑफिस की सीढ़ियाँ 

बीत गया एक और दिन।

 

ऑफिस से घर को जोड़ती 

कहीं चौड़ी  

कहीं सँकरी सड़क 

सड़क के दोनों ओर 

छितराया जीवन।

 

मौन-बतकही 

प्यार-नफरत 

खुशी-गम 

सबकी सुध लेते 

बेसुध से हम 

डूब गया सूरज।

 

बीत गयी साँझ 

आगे है 

सपनों वाली रात 

कल फिर एक नया 

काम जुटा दिन।


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