भूलकर भी
भूलकर भी
भूलकर भी, नहीं करना चाहिए वो काम,
जिसके करने से, पल में जन हो बदनाम,
लेना चाहिए भोर शाम बस प्रभु का नाम,
मात पिता की सेवा होती सच्चा एक धाम।
भूलकर भी, कुपथ मार्ग पर नहीं चलना,
वरना वो दिन दूर नहीं, हाथ पड़े मलना,
हर दुख में थोड़ा सा, जरूर ही संभलना,
हो सके तो प्रयास से,समाज को बदलना।
भूलकर भी, नहीं करो बड़े बुजुर्ग अपमान,
मात पिता गुरु देव से, लेना हो सच्चा ज्ञान,
जीवन में सदा, छोड़ देना मन से अभिमान,
बुराई से दूर रहकर, सोना चादर को तान।
भूलकर भी, पाप,बुराई अत्याचार न करो,
बस मालिक है वो, उस दाता से ही डरो,
गरीब, पतित के संताप,हरदम मन से हरो,
जग में मरना भी हो, पहचान पाकर मरो।
भूलकर भी, चुगली चाटा मत नहीं करना,
लोग ही देव होते, चुगली करने से डरना,
जीवन माना जाता है, जैसे होता है झरना,
पापों का फल भोग, यही पर ही हो भरना।
भूलकर भी, लोभ और लालच नहीं करो,
धोखा होता बहुत बुरा, धोखा देने से डरो,
बुराई तुम्हारी करता हो, चित पर नहीं धरो,
संताप और दुख गरीब के तन मन से हरो।
भूलकर भी, नारी का अपमान नहीं करना,
बालक और भूखे पर, हो सके रहम करना,
सूर्य सम अपनी सोच को जनहित में लगा,
बुराई करते रहने बेहतर है इंसान को मरना।
भूलकर भी,वादा करके नहीं भूलना चाहिए,
सेवा जन की करके, आशीर्वाद कुछ पाइये,
ऋण किसी का लेकर, कभी नहीं हो भूलना,
सच्चा दोस्त जब मिले,गले से जरूर लगाइये।।
