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Meena Mallavarapu

Tragedy

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Meena Mallavarapu

Tragedy

बहते लहू की शिकायत

बहते लहू की शिकायत

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मेरे लहू के हर बूंद की

है बस यही शिकायत-

क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा

हाथ धो कर पड़े हो यूं पीछे

आज मांगना है हिसाब मैंने

लहू की हर उस बूंद का

जो इन्सानों के रूप में हैवानों ने

दिलो दिमाग को रख कर परे

बहा दी इस बेबस ,मूक धरती पर

क्या आयेगी , कैसे आएगी नींद तुम्हें?

बर्बर बन जीवन को सौंप रहे हो

मौत के हाथ!

कैसे,कैसे बढ़ते हैं यह हाथ

खून की नदियां बहाने को?

उस दर्द और डर की परछाई

देख किसी की आखों में

क्या पिघलता नहीं तुम्हारा मन

क्या महसूस नहीं किया तुमने कभी

यही दर्द और यही डर?

लगता है शायद तुमने भी

यही दर्द और यही डर

महसूस किया है और संजोया भी

और बदले की वह आग

लाई है खींच तुम्हे

बदले की वही आग

ले आई इस मुकाम पर तुम्हें

मगर यह कैसी दवा हुई,कैसा हुआ यह बदला

जो एक नए छोर से

करता है तुम्ही पर हमला?

ले तो लिया तुमने आधा अधूरा हिसाब

कुछ नाइन्साफ़ियों का

और शुरू कर दिया एक खाता नया

बदले की एक नई कड़ी

दुख दर्द की एक धधकती लड़ी

लेकिन पूरे होते हैं क्या कभी ऐसे हिसाब?

सोचा होगा किया कि जी हो जाएगा ठंडा

जीवन हो जाएगा सार्थक

पर अचंभा यह कि फैल गया नस नस में

वह विष जिसे लिए अब घूम रहे हो

सोचा होगा खून से धुल जाएगा हर गिला शिकवा

पर हुआ नहीं कुछ ऐसा!

आज नींद नहीं चैन नहीं

भरा पड़ा है विष तुम्हारे बाहर अन्दर

दबा रहे हो खुद में, नफ़रत का बवंडर!

झुलसा दी जीवन की हर कविता

जो करती थी बचपन में आत्म विभोर-

आज विकराल रूप धारण किए

दिखता है हर रूप में,हर रंग में

हर सपने में,हर सच में

वही खून का दरिया

वही ख़ून की छींटें,

वही लाल लहू देखो

फैल गया है चारों ओर

नई नई परिभाषाएं लिए

चैन की नींद नहीं तुम्हारी अब

सुख शांति की तमन्ना ,जज़्बों की कद्र

के हक़दार कहां तुम अब

झुलसा ली जीवन की हर कविता

जो थी बेशुमार खुशियों का खज़ाना

बेइंतहा ख़ूबसूरत

बचपन के वह सारे सपने

आज बन कर राख़

हैं तपते और झुलसते

इस रूखी, बेजान सी जान को।

हिसाब-किताब की

गुंजाइश ही कहां रही अब

अपने ही सुकून ,हंसी और कहकहों

का खून जो कर दिया तुम्ही ने।।



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