भ्रष्टाचार- एक संक्रामक रोग
भ्रष्टाचार- एक संक्रामक रोग
सच ना मैं कह पाऊँगी,
ना सुन तुम पाओगे,
आखिर खुद को टटोलना,
इतना भी आसान नहीं,
सब कुछ इन पन्नों से कह देना,
इतना भी आसान नहीं,
सब देखकर भी ना समझना,
खुद को फिर उस मंजर पे रखना,
आखिर मन को समझाना,
इतना भी आसान नहीं,
सब कुछ इन पन्नों से कह देना,
इतना भी आसान नहीं,
इस देखी अनदेखी में उलझना,
औरों को भी शामिल करना,
आखिर अपने ज़मीर को मारना,
इतना भी आसान नहीं,
सब कुछ इन पन्नों से कह देना,
इतना भी आसान नहीं,
खुद संग औरों को भी,
जब इस दलदल में पायेंगे,
बाहर निकलने की कशमकश,
में और भी गहरे फँस जायेंगे,
आखिर झूठ में जीना,
इतना भी आसान नही,
सब कुछ इन पन्नों से कह देना,
इतना भी आसान नहीं,
दस्तूर है ये,इतना कहने से,
सब वाज़िब ना हो पाएगा,
आखिर सच को ढकना,
इतना भी आसान नही,
सब कुछ इन पन्नों से कह देना,
इतना भी आसान नहीं।।
