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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Fantasy

4  

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Fantasy

भोर

भोर

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भोर हुई चिड़ियों ने गाया गाना

बिखर गया चहुं ओर उजाला 

नव उमंग से मोर नाचते

नई -नवेली कलियों पर भंवरे मंडराते।


पूरब में सूरज खड़े लिए धूप का रथ 

देखो हुआ अंधेरा सारा छू-मंतर 

पेड़ों की डालों पर फुदक रही गोरैया 

छत पर दाना बिखराता है रामू भैया।


सारे जग को रोशन करता सूरज एक

ठीक समय पर आकर रोज जगाता 

हमसे बदले में कुछ नहीं पाता 

फिर भी धूप सुनहरी हमको दे जाता।


सूरज के स्वागत में जल्दी उठ जायें,

झटपट अपनी दिनचर्या पूर्ण कर जायें

नव किरणों के साथ नव किरणों सा मुसकायें,

मत करना आना-कानी, इसी तरह रोज जग जायें।


साहित्याला गुण द्या
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