भक्ति रहस्य
भक्ति रहस्य
हे सखी कहो, अब क्या मैं करूँ,
मेरे रूठे पिया मनाने को।
मेरा मन अधीर, मति हुई क्षीण,
कैसे जाऊँ समझाने को ।
अंखियन रोंऊ, पाँवन बैठूँ या,
चुप हो जाऊँ सताने को।
हे प्राण प्रिये अब, तुम ही कहो,
क्या करूँ मैं बिगड़ी बनाने को॥
हे सखी तू, क्यूँ कर रोती है,
तेरे रूठे पिया मनाने को।
तू केश सजा, श्रृंगार बना,
निज प्रीतम नयन रिझाने को।
जा निकट बैठ, मन धीरज धर,
अंखियन में देख समाने को।
हे रूपवती, हे प्राण प्रिये,
तेरे अधर बहुत है मनाने को॥
