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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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भागते हुए समय से

भागते हुए समय से

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भागते हुये समय से

एक पल समेट लिया है हमने

आरक्षण की तरह।

शायद ये पूरा एक जीवन है


ठहरा हुआ,

भागती हुयी कठपुतलियां,

 विचारों की भीड़ ,

और अनियंत्रित शोर में भी।


मैंने समय से कह दिया

जिसे फक्र था अपने न रुकने का कि

भाग लो,भाग लो

पर ये भी देखो

तुम आ भी रहे हो मेरे पास

जितना भाग रहे हो मुझसे

उससे जरा भी कम नहीं।


तुम्हारे आने और जाने के

अंतराल में

ठहरा हुआ जीवन,

तुम्हारा उपहार है

और हम इसका

आनन्द लें रहे हैं

तब भी जब कुछ 

आनन्ददायक है नहीं।


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