बेटी की विदाई
बेटी की विदाई
रौनक चारो और थी झूम रहा था जग सारा
खुशिया फैली हुई थी सजा हाउस था मण्डप प्यारा
सब खुश थे पर एक पिता के मन मे आज चिंता थी
अपनी जान से प्यारी बेटी आज करनी उसे विदा थी
वरमाला हुई, फेरे हुए और अब विदाई की घड़ी थी
पिता होने लगा भावुक, दुल्हन के जोड़े में बेटी आज खड़ी थी
मन को ना सम्भाल सका, आंखों से बहने लगा खारा पानी
सीने से लगाकर बेटी को कहने लगा यह वाणी
बेटी ! याद आ रही बहुत आज तेरे बचपन की
तेरे साथ बिताए हुए हर पल और हर क्षण की
तेरा गुड़िया के लिए रोना और भाई से झगड़ना
बड़ा याद आ रहा आज मुझे तेरे साथ लड़ना
खेलती थी तू आंगन में, ऐसा लगता कल की तो बात है
पलक झपकते ही बीतता है वक्त, आज मेहंदी रचे तेरे हाथ है
हर गम को मैं भूल जाता जब तू मेरे गले लगती थी
खुशी का खजाना मेरे लिए खुलता जब तू हँसती थी
आज बड़ी याद आ रही तेरी नादानियों की
भोलेपन में करी हुई तेरी शैतानियों की
याद आ रही मासूमियत भरी निगाहों की
याद आ रही आज तेरी नटखट अदाओ की
बेटी तू चली जाएगी कैसे कटेगा मेरा जीवन
तू अकेली नही जा रही, तेरे साथ जा रहा है मेरा मन
मेरे आंगन का फूल किसी और क बगीचे में महकेगा
मेरे अम्बर का पक्षी किसी और के आकाश में चहकेगा
बेटी ! तू भले जा रही हो बाबुल का घर छोड़कर
पर मत सोचिओ जा रही है अपने रिश्ते तोड़कर
यह घर कल भी तेरा था, कल भी तेरा रहेगा
तेरे ऊपर हर दम हर क्षण साया मेरा रहेगा
जा बेटी, अब तू अपना नया संसार रचा
अपने प्यार से तू अब एक और घर बना
तू हमेशा रहेगी अपने पापा की राजकुमारी
बेटी हमेशा रहती है पापा की लाड़ दुलारी
विदा लेकर परिवार से बेटी की हुई विदाई
बेटी से बहु बनी, राजकुमारी अब रानी कहलाई
पर पिता तो आज भी बेटी की ही यादों में खोया था
जाने के बाद बेटी के, वो चुप चाप रोया था।
